Classification of living beings (जीवों का वर्गीकरण)



जीवविज्ञान ---

जीवविज्ञान एक प्राकृतिक विज्ञान हैं जिसमें सभी प्रकार के जीवों की  संरचना, वृद्धि, कार्य, विकास, वितरण, वर्गिकी, नामकरण सहित जीवों के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
जीवविज्ञान यह स्वीकार कराता  है कि कोशिका जीवन की आधारभूत इकाई है इसी प्रकार जीन वंशानुगती की आधारभूत इकाई है ।

: आधुनिक वर्गीकरण विज्ञान के जनक - कैरोलस लिनियस है।

: जीवविज्ञान के जनक - अरस्तू है।

: वनस्पति विज्ञान के जनक - थ्रियो फ्रेस्ट्स है।

कोशिका सिद्धांत -- स्लीदन व स्वान ने कोशिका सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसके अनुसार -
1. कोशिका जीवों की आधारभूत इकाई है।
2. प्रत्येक कोशिका में एक जीव से संबंधित सभी लक्षण पाए जाते हैं।
3. प्रत्येक नई कोशिका पुरानी कोशिका के विभाजन से बनती हैं।

सजीवता के प्रमुख लक्षण --
.गति
 . वृद्धि
 . पाचन
 . उपापचय
. स्वसन
 . जनन
 . पोषण
. संवेदनशीलता तथा अनुकूलन . उत्सर्जन
 . समस्थिती का प्रदर्शन
 . आनुवंशिक पदार्थो का अगली पीढ़ी में स्थानांतरण । आदी।



पादप व जंतुओं में अंतर---
1. कोशिका भित्ति -
पादप में कोशिका झिल्ली के अलावा सेल्यूलोज की बनी निर्जीव कोशिका भित्ति भी पाई जाती हैं जबकि जंतुओं में कोशिका भित्ति का अभाव होता है।
2. पर्णहरित -
पोधे स्वपोशी अर्थात अपना भोजन स्वयं बनाने में सक्षम होते हैं क्योंकि उनमें पर्णहरित पाया जाता है जबकि जंतुओं में पर्णहरित का अभाव होता है अतः ये परपोशित होते हैं।
3. प्रकाश संश्लेषण -
हरे पोधों सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में जल व carbon-dioxide , का उपयोग  कर भोजन बनाते हैं,इस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं जबकि जंतुओं में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं होती हैं अतः ये पोधौ पर आश्रित होते हैं।
4. गति-
पोधा जड़ों की सहायता से भूमि में स्थिर रहते हैं,किन्तु  इनके कुछ अंश तना, पत्ती उनके स्थान पर गति दर्शाते हैं जबकि जंतु एक स्थान  दूसरे स्थान गमन करते हैं।
5.वृद्धि-
 पौधों में मैं विधि वृद्धि कुछ विशेष स्थानों पर विभाज्योत्तक द्वारा होती हैं। जबकि जंतुओं में वृद्धि सभी स्थानों पर होती है।
6.खनिजों का अवशोषण
 पौधे का अवशोषण भूमि में उपलब्ध जल से घुलित अवस्था में प्राप्त करते हैं। जबकि जंतु अपना भोजन ठोस रूप में लेते हैं।
7.तारककाय सेंट्रोसोम
 पादपों में तारक काय अनुपस्थित होता है जबकि जंतुओं में उपस्थित होता है तथा कोशिका विभाजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
8.रसधानी
 पूर्ण विकसित पादप कोशिका में एक बड़ी रसधानी उपस्थित होती है जबकि जंतुओं में रसधानी का अभाव होता है।
9.लाइसोसोम 
कुछ अपवादों को छोड़कर पादपों में लाइसोसोम के समकक्ष कुछ रचनाएं पाई जाती हैं जबकि लाइसोसोम केवल जंतु कोशिकाओं में ही पाए जाते हैं।
10.अंगतंत्र 
 पादपो में स्पष्ट अंग तंत्र का अभाव होता है इनमें मूल स्तंभ पत्तियों व पुष्प जैसे अंगों में विभेदन होता है जबकि जंतुओं में स्पष्ट अंगतंत्र पाया जाता है।
11.उत्सर्जन तंत्र
 पादपों में विशेष उत्सर्जन अंग नहीं होते हैं किंतु पौधे इन अपशिष्ट पदार्थों को छाल व पत्तियों द्वारा बाहर निकालते हैं जबकि जंतुओं में विशेष उत्सर्जन तंत्र पाया जाता है जिनसे अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं।
12.कोशिका द्रव्य विभाजन 
पादपो में यह विभाजन कोशिका पट्ट निर्माण द्वारा होता है जबकि जंतुओं में विभाजन पूर्ण केंद्रको के बीच अंतरवलन विधि द्वारा होता है
13. जनन
 सामान्य लैंगिक जनन के अतिरिक्त  पादपों  में कायिक व अलेंगिक जनन भी होता है जबकि अधिकांश जंतु अपनी वंश वृद्धि केवल लैंगिक जनन के द्वारा ही कर सकते हैं।




जीवों का वर्गीकरण 

वर्गीकरण का अर्थ -
पादप एवं जंतुओं का उनकी पहचान तथा पारस्परिक संबंधों व वर्गिकी समूह के आधार पर वैज्ञानिक व्यवस्थापन वर्गीकरण कहलाता है।
जंतुओं में जगत व फाइलम तथा पादपों में डिवीजन, वर्ग, गण, कुल, वंश, जाति आदि वर्गिकी समूह हैं।

हरे पादप स्वपोषी जबकि कब के अवशेषी होते हैं इन्हीं लक्षणों को ध्यान में रखते हुए सन 1969 में आर.एच. व्हीटेकर ने वर्गीकरण की पंच जगत पद्धति प्रतिपादित की जिसमें पांच जगत मोनेरा, प्रोटिस्टा, प्लांटी, व एनिमैलिया है। 
इस पद्धति में जीवों की कोशिका संरचना, थैलस संरचना, पोषण प्रक्रिया, जन्न, एवं जातिवित्तीय संबंध वर्गीकरण के प्रमुख मापदंड थे।



विषाणु या वायरस 

विषाणु शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द वायरस से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है विष अणु।इन्हे जीवाणुज फिल्टर से पृथक नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह आमाप में जीवाणुओं से भी छोटे कण होते है रासायनिक दृष्टि से यह प्रोटीन के आवरण से गिरे न्यूक्लिक अम्ल के खंड होते हैं ।
वायरस की खोज का श्रेय डच वनस्पतिज्ञ ने की। उसने तंबाकू की मोजेक रोग से ग्रस्त पत्तियों  पर कार्य करते हुए वायरस की खोज की।
वार्ट तथा डी. हैरैली ने स्वतंत्र रुप से जीवाणुभोजी वायरस की खोज की।

वायरस की प्रकृति 
विषाणु अति सूक्ष्म अकोशिकीय कनिकामय संरचनाएं होती हैं जिन्हें सूक्ष्मदर्शी से देखा नहीं जा सकता है इसका अध्ययन केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा किया जा सकता है इन्हें किसी फिल्टर से अलग नहीं किया जा सकता है और कृतिम संवर्धन माध्यम में नहीं उगाया जा सकता है इसमें जिवद्रव्यअनुपस्थित होता है विषाणु केवल परपोषी उत्तक में ही सजीवता के लक्षण उत्पन्न करते हैं तथा यह जीवित कोशिका में ही गुणन करते हैं विषाणु का क्रिस्टलीकरण करके उन्हें क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया जा सकता है विषाणु सदैव अविकल्पी परजीवी है तथा सुगमता से एक परपोषी से दूसरे में स्थानांतरित हो जाती है इन पर प्रतिजैविक का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है किंतु इन्हें उपचार द्वारा निष्क्रिय किया जा सकता है तथा आद्रता के प्रति अनुक्रिया दर्शाते हैं इनकि संरचना में प्रोटीन का आवरण होता है तथा अंदर दोनों न्यूक्लिक अम्ल में से एक होता है इनके अंदर जैविक क्रियाएं जैसे स्वसन, प्रकाश संश्लेषण, वृद्धि नहीं होती है।



विषाणुओं कि संरचना





विषाणुओं के जैविक गुण
 विषाणुओं का गुणन मात्र जीवित कोशिकाओं में ही हो सकता है।
 विषाणु परपोषी के प्रति विशिष्टता दर्शाते हैं।
जीवाणु एवं कवक के जैसे किसी भी स्वस्थ पौधों को संक्रमित कर सकते हैं इनमें न्यूक्लिक अम्ल डी.एन.ए. व आर.एन.ए. होता है व प्रतिजनी गुण होते हैं यह विकिरण प्रकाश, रासायनिक पदार्थों, अम्ल क्षार तथा तापक्रम जैसे उदीपकों के प्रति क्रिया दर्शाते हैं विषाणु में अनुवांशिकी पदार्थों की पुनरावृत्ति होती है जो सजीवों का मुख्य लक्षण है
विषाणु के निर्जीव गुण
इसमें कोशिका भित्ति, प्लाज्मा झिल्ली, तथा कोशिकांगो का अभाव होता है इसमें स्वसन, वृद्धि इत्यादि जैविक क्रियाएं नहीं होती हैं।
विषाणुओं को क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया जा सकता है जो केवल निर्जीव में ही संभव है
ये विशिष्ट परपोषी के बाहर निष्क्रिय  रहते हैं यह स्वउत्प्रेरक होते हैं तथा इसमें कार्यशीलता स्वायत्तता नहीं होती है इन में एंजाइम का अभाव होता है विभिन्न रासायनिक पदार्थों की सहायता से इनका अवशोषण किया जा सकता है।


विषाणुओं का आर्थिक महत्व 

लाभदायक प्रभाव -
अनेक विषाणुओं का उपयोग फसल के लिए हानिकारक जीवाणुओं के उन्मूलन व रोकथाम के लिए किया जाता है इसे जैविक नियंत्रण कहते हैं ।
विशिष्ट प्रकार के वायरस का संवर्धन कर विशिष्ट रोग के निवारण हेतु वैक्सीन बनाने में किया जा सकता है।
 अनुसंधान कार्य में उपयोगी है। हर्षे व चेस ने यह सिद्ध किया कि DNA अनुवांशिकी का रासायनिक आधार है ।
गंगा नदी के जल में असंख्य जीवाणु उपस्थित होते हैं तथा यह नदी के जल में उपस्थित रोगजनक जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं इस तरह यह अपमार्जक का कार्य कर गंगा नदी के जल को हमेशा शुद्ध बनाए रखते हैं।
 अंतरिक्ष सूक्ष्म विज्ञान में जीवाणुभोजीयों का उपयोग विकिरण संकेतक के रूप में होता है।
 अनेक विषाणु प्रतिजैविक पदार्थों के उत्पादन को रोकते हैं ।

हानिकारक प्रभाव -

विषाणु जनित महत्वपूर्ण मानव रोग -
रोग-रोग पैदा करने वाला विषाणु 

1.चेचक-पाक्स विषाणु 
2. इन्फ्लुएंजा-ऑर्थोमिक्सो वायरस    3.खसरा-मिक्सो वायरस
4. पोलियो-पोलियो वायरस
5. रेबीज-रैब्दो वायरस 
6.हेपेटाइटिस-हिपेटाइटिस वायरस
7. जुकाम-राइनो वायरस 
8. पीला बुखार-कोक्सेकिया वायरस
9.एड्स-HIV वायरस।

विषाणु जनित पादप रोग
1.टमाटर का कुचिताग्र रोग 
2.तंबाकू मोजेक
3. भिंडी का पीला शिरा मोजेक
4. आलू का मोजेक 
5.पपीते का मोजेक 
6.मक्का का घांटी रोग 
7.चावल का वामन रोग
8. केले का मोजेक।



जीवाणुभोजी

वे विषाणु जो जीवाणु कोशिका के अंदर परजीवी होते हैं उन्हें जीवाणुभोजी या बैक्टीरियोफेज कहा जाता है।
 संरचना
एक जीवाणु भोजी टैडपोल के समान सिर व पूंछ में विभेदन होता है अधिकांश जीवाणुभोजी में सिर प्रिज्म  के समान होता है ।
इसके अतिरिक्त कुछ जीवाणुभोजी तंतुमय होते हैं तथा सिर वह पूछ में विभाजन नहीं होता है सिर् व  पूंछ के नीचे का भाग कालर कहलाता है पूंछ व सिर की लंबाई बराबर होती है तथा यह प्रोटीन की परत से ढका रहता हैं।
पुच्छ के पास एक षटकोनिय प्लेट होती है जिसे उच्च प्लेट कहा जाता है।
 इस प्लेट की निचली सतह पर 6 पुच्छ तंतु पाए जाते हैं।

 पुच्छ तंतु के मुख्य दो कार्य होते हैं-
1. जीवाणुभोजी को जीवाणुओं की सतह से चिपकाने में सहायता करते हैं.
2. इसके द्वारा स्त्रावित एंजाइम जीवाणुओं की भित्ति के लयन में सहायक होते हैं ।

जीवाणुभोजी का प्रिजमाय सिर नुक्लियोकैपसाइड का बना होता है,
 और इनका निर्माण करने वाले सभी प्रोटीन एक समान होते हैं ।
सिर के केंद्र में एक डीएनए का केंद्रीय कोड होता है, जो प्रोटीन के एक अलग आवरण से ढका होता है।
 आंतरिक कवच का निर्माण करने वाली प्रोटीन  उपइकाइयों को `कैपसोमियर्स` कहलाती है।


सभी विषाणु अकोशिकीय कणिकिय संरचना के होते हैं, यह न्यूक्लिक अम्ल व प्रोटीन के बने होते हैं। न्यूक्लिक अम्ल में RNA या DNA पाया जाता है। यह विषाणु का केंद्रीय कॉर होता है। न्यूक्लिक अम्ल के चारो ओर प्रोटीन का आवरण होता है जो न्यूक्लिक अम्ल की रक्षा करता है, तथा विषाणु की सममितो के लिए उत्तरदाई होता है। प्रोटीन की उपइकाइयों को `कैपसोमियर्स` कहा जाता है।

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